विशेष - कथनी और करनी...

कथनी और करनी...



Posted Date: 08 Mar 2019

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पुलवामा हमले के बाद भारतीय वायु सेना ने पाकिस्तानी सीमा में पनप रहे आतंकी ठिकानों पर लक्षित हमला कर दहशतगर्दों की कमर तोड़ने का प्रयास किया। पाकिस्तानी हुकूमत ने भारत की इस कार्रवाई को मुल्क की वायु सीमा क्षेत्र का उल्लंघन करार दिया और इसका माकूल जवाब देने की बात कही थी। हालांकि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने जिस अंदाज में जंग को किसी के भी हित में न बताते हुए शांति का संदेश देने की कोशिश की थी और बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ाने का ज़िक्र किया, उससे ऐसा प्रतीत हो रहा था कि पड़ोसी मुल्क दोनों देशों के संबंधों में आए तनाव को खत्म करने को लेकर गंभीर है। लेकिन हकीकत यह है कि पाकिस्तान की कथनी और करनी में ज़मीन-आसमान का अंतर है। वह कहता कुछ है और करता कुछ। बीते दिनों नियंत्रण रेखा पर सिलसिलेवार ढंग से हुआ संघर्ष विराम उल्लंघन का ताजा उदाहरण है।

पाकिस्तान पिछले कुछ दिनों से लगातार नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर संघर्ष विराम का उल्लंघन कर रिहायशी इलाकों और भारतीय चौकियों को निशाना बना रहा है। विगत एक सप्ताह के भीतर पाकिस्तान अंतर्राष्ट्रीय सीमा और एलओसी पर करीब 20 बार संघर्ष विराम का उल्लंघन करते हुए बारी गोलीबारी की और मोर्टार दागे। दो दिन पहले ही जम्मू-कश्मीर को नौशेरा सेक्टर में पाकिस्तान की ओर से भारी गोलाबारी में 4 भारतीय नागरिक मारे गए। इसके पहले भी पुंछ की कृष्णा घाटी में पाकिस्तानी गोलीबारी से एक युवती और दो बच्चों की मौत हो गई थी। पिछले एक साल में पाकिस्तान सैकड़ों बार संघर्ष विराम का उल्लंघन कर चुका है। अगर वह सचमुच अमन चाहता, तो इस तरह संघर्ष विराम का उल्लंघन न करता।

पुलवामा हमला और वायुसेना की कार्रवाई के बाद अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की जिस तर सभी देशों ने एक स्वर में निंदा की और भारत का समर्थन किया, उससे भी शायद पड़ोसी देश और उसके शीर्ष नेताओं ने कोई सबक नहीं लिया है। वहां के वज़ीर-ए-आज़म (प्रधानमंत्री) इमरान खान वायुसेना के हमले के बाद वीडियो संदेश जारी करते हैं। इसमें वे कहते हैं कि वे शांति चाहते हैं। इसके अगले ही दिन उनके युद्धक विमान भारतीय वायुसीमा क्षेत्र में घुसकर सैन्य ठिकानों को निशाने बनाने की नाकाम कोशिश करते हैं। इस दौरान उनका एक विमाम मारा जाता है। इन सब के बाद इमरान खान संसद में शांति और बातचीत से मसले सुलझाने की बात करते हैं और भारत सरकार को पुलवामा हमले पर किसी भी प्रकार की जांच और कार्रवाई का न्यौता देते हैं।

इन सभी नाटकीय बातों के जरिये पाक प्रधानमंत्री ने दुनिया के सामने अपना मासूम चेहरा पेश करना का भरकस प्रयास किया। लेकिन उनका मासूम चेहरा उस वक्त बेनकाब हो गया जब भारत को इस्लामिक देशों के संगठन आइओसी के सम्मेलन में शामिल होने का न्योता मिलने पर पाकिस्तान ने उसका बहिष्कार कर दिया। अगर पाकिस्तान सरकार और उसके नेता सचमुच भारत के साथ मसले सुलझाने को लेकर गंभीर होते, तो उनके मन में भारत के प्रति इतनी कटुता न होती। सीमा पर संघर्ष विराम को लेकर लापरवाही न होती। इमरान की अमन और तरक्की पसंद की बातों से एक बार को तो यही लगा था कि शायद सरकार, सेना और वहां की खुफिया एजंसी के बीच इस मसले को लेकर कोई सहमति बनी होगी। पर संघर्ष विराम उल्लंघन ने एक बार फिर यही साबित किया है कि पाकिस्तानी सेना का रुख बिल्कुल नहीं बदला है।

उसकी कथनी और करनी में विरोधाभास है। क्योंकि वह सीमा पर लगातार गोलीबारी करता है और देश की संप्रभुता और अखण्डता को चोट पहुंचाने के लिए चरमपंथियों को सीमा पार कर देश में आतंक फैलाने के लिए मदद करता है। यही नहीं जब उसके देश में पनाह लिए वैश्विक आतंकियों पर अतर्राष्ट्रीय स्तर की कोई कार्रवाई होनी शुरु होती है, तो पाकिस्तान इसकी खिलाफत करता है। यही नहीं उसकी खुफियां एजेंसी और सेना इन वैश्विक आतंकियों को सुरक्षित ठिकाना मुहैया कराती हैं और पाकिस्तान की सरकार चुप बैठती है। पाकिस्तान के ऐसे दोहरे रवैये से भला कहां तक शांति और बातचीत के माध्यम से विवादों को हल करने की उम्मीद की जा सकती है।


BY : shashank pandey




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