राष्ट्रीय - चाहकर भी इस ज़हर से बच पाना मुश्किल, हर सांस के साथ रगों में घुलकर निगल रहा जिंदगी

चाहकर भी इस ज़हर से बच पाना मुश्किल, हर सांस के साथ रगों में घुलकर निगल रहा जिंदगी



Posted Date: 27 Aug 2018

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तकनीक और विज्ञान के योगदान से दिन-ब-दिन बदलती इस दुनिया में प्रदूषण एक बड़ी समस्या बनकर उभर रहा है। चूंकि इंसान को ज़िंदा रहने के लिए स्वच्छ वायु की आवश्यकता होती है। ऐसे में बढ़ता वायु प्रदूषण इंसान की जिन्दगी को धीरे-धीरे निगलने जैसा ही है। हाल ही में किये गए एक अध्ययन से इस बात का खुलासा हुआ है कि वायु प्रदूषण ना केवल इंसान की सेहत पर असर डाल रहा है, बल्कि इसके कारण इंसान की जिन्दगी भी कम होती जा रही है।

खबरों के मुताबिक़ वैज्ञानिकों की ओर से करवाए गए एक अध्ययन में इस बात का खुलासा हुआ है कि हवा में घुल चुके प्रदूषण से औसत भारतीय की उम्र डेढ़ साल तक कम हो जाती है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि हवा की बेहतर गुणवत्ता से दुनियाभर में मनुष्य की उम्र बढ़ सकती है। यह पहली बार है जब वायु प्रदूषण और जीवन अवधि पर डेटा का एक साथ अध्ययन किया गया है ताकि यह पता लगाया जा सके कि इसमें वैश्विक अंतर कैसे इंसान की लाइफ एक्सपेक्टेंसी पर असर डालता है।

बता दें अमेरिका के ऑस्टिन में टेक्सस यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने वायुमंडल में पाए जाने वाले pm 2.5 कण से वायु प्रदूषण का अध्ययन किया।

ये सूक्ष्म कण फेफड़ों में प्रवेश कर सकते हैं और इससे दिल का दौरा पड़ने, स्ट्रोक, श्वसन संबंधी बीमारियां और कैंसर जैसी गंभीर बीमारी होने का खतरा रहता है। पीएम 2.5 प्रदूषण बिजली संयंत्रों, कारों और ट्रकों, आग, खेती और औद्योगिक उत्सर्जन से होता है।

वहीं शोधकर्ताओं ने ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज स्टडी के डेटा का इस्तेमाल कर pm 2.5 कण से वायु प्रदूषण का 185 देशों में क्या असर पड़ता है इस बारे में भी जांच की।

इसके बाद हर देश में वायु प्रदूषण का वहां रहने वालों नागरिकों के अनुमानित जीवनकाल पर क्या असर पड़ता है इस बारे में जांच की गई।

इसके अलावा शोधकर्ताओं का कहना है कि WHO की मानें तो वायु गुणवत्ता के लिहाज से अगर पीएम 2.5 के स्तर को 10 माइक्रोग्राम प्रति वर्ग घन मीटर रखा जाए तो दुनिया की औसत आयु 0.59 वर्ष बढ़ सकती है।

प्रदूषण से किस देश में घटती है कितनी उम्र?

  • बांग्लादेश में 1.87 वर्ष
  • मिस्र में 1.85 वर्ष
  • पाकिस्तान में 1.56 वर्ष
  • भारत में 1.53 वर्ष
  • सऊदी अरब में 1.48 वर्ष
  • नाइजीरिया में 1.28 वर्ष
  • चीन में 1.25 वर्ष

वहीं दूसरी ओर विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने साल 2016 में दुनिया के 15 सबसे प्रदूषित शहरों की सूची जारी की थी। इस लिस्ट में 14 नाम भारतीय शहरों के हैं, जिसमें कानपुर टॉप पर, वाराणसी तीसरे नंबर और पटना पांचवें नंबर पर है। दिल्ली का स्थान इस सूची में छठे नंबर पर है।

WHO के डेटाबेस से पता चलता है कि 2010 से 2014 के बीच में दिल्ली के प्रदूषण स्तर में मामूली बेहतरी हुई है लेकिन 2015 से फिर हालत बिगड़ने लगी है।

हालांकि रिपोर्ट में शामिल पूरी दुनिया के 859 शहरों की वायु गुणवत्ता के आंकड़ों को देखें तो यह चिंता बढ़ाने वाली है।

भारत के 14 शहरों का इसमें शामिल होना इसलिए भी चिंता पैदा करता है, क्योंकि अभी हमारे देश में वायु प्रदूषण संकट से निपटने के लिये बहुत कुछ किया जाना बाकी है।

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टॉप 15 शहर 1. कानपुर (173 माइक्रोग्राम/ क्यूबिक मीटर) 2. फरीदाबाद (172 माइक्रोग्राम/ क्यूबिक मीटर) 3. वाराणसी (151 माइक्रोग्राम/ क्यूबिक मीटर) 4. गया (149 माइक्रोग्राम/ क्यूबिक मीटर) 5. पटना ( 144 माइक्रोग्राम/ क्यूबिक मीटर) 6. दिल्ली (143 माइक्रोग्राम/ क्यूबिक मीटर) 7. लखनऊ (138 माइक्रोग्राम/ क्यूबिक मीटर) 8. आगरा (131 माइक्रोग्राम/ क्यूबिक मीटर) 9. मुजफ्फरपुर ( 120 माइक्रोग्राम/ क्यूबिक मीटर) 10. श्रीनगर (113 माइक्रोग्राम/ क्यूबिक मीटर) 11. गुरुग्राम (113 माइक्रोग्राम/ क्यूबिक मीटर) 12. जयपुर (105 माइक्रोग्राम/ क्यूबिक मीटर) 13. पटियाला (101 माइक्रोग्राम/ क्यूबिक मीटर) 14. जोधपुर (98 माइक्रोग्राम/ क्यूबिक मीटर) 15. अली सुबाह अल सलीम (कुवैत) (94 माइक्रोग्राम/ क्यूबिक मीटर)

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बता दें इसी साल के शुरू में ग्रीनपीस इंडिया ने जारी अपनी रिपोर्ट एयरोप्किल्पिस 2 में भी 280 भारतीय शहरों के आंकडों को शामिल किया था।

इस रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आया था कि 80 प्रतिशत शहरों की हवा सांस लेने योग्य नहीं है, जो डब्लूएचओ की रिपोर्ट से भी ज्यादा खतरनाक तस्वीर पेश करती है।


BY : Ankit Rastogi


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