विशेष - जगजीत सिंह : ऐसा शख़्स जिसने नवाबों, रक्कासाओं की दुनिया में झनकती गज़ल को अवाम तक पहुंचाने का काम किया

जगजीत सिंह : ऐसा शख़्स जिसने नवाबों, रक्कासाओं की दुनिया में झनकती गज़ल को अवाम तक पहुंचाने का काम किया



Posted Date: 08 Feb 2019

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'चाहे छीन लो मुझसे मेरी जवानी, मगर मुझको लौटा दो वो बचपन का सावन, वो कागज की कश्ती, वो बारिश का पानी' हो या 'चिट्ठी न कोई संदेश, जैसे गीतों को रचकर अपनी आवाज़ के दम पर करोड़ों दिलों पर राज़ करने वाले मशहूर गायक जगजीत सिंह का जन्म 8 फरवरी 1941 को हुआ था। उनकी गज़लों ने न सिर्फ उर्दू के कम जानकारों के बीच शेरो-शायरी की समझ में इज़ाफा किया बल्कि गालिब, मीर, मजाज़, जोश और फिराक जैसे शायरों से भी उनका तआरुफ कराया।

राजस्थान के गंगानगर में जन्मे जगजीत सिंह के पिता भारत सरकार के कर्मचारी थे। उनका परिवार मूलतः पंजाब के रोपड़ जिले के दल्ला गांव का रहने वाला था। जगजीत का बचपन का नाम जीत था। करोड़ों सुनने वालों के चले सिंह साहब कुछ ही समय बाद जग को जीतने वाले जगजीत बन गए। गंगानगर के खालसा स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा हासिल करने के बाद वह जालंधर आ गए। वहां से स्नातक की पढ़ाई करी उसके बाद कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से इतिहास में पोस्ट ग्रेजुएशन भी किया।

पिता की ख्वाहिश थी कि उनका बेटा भारतीय प्रशासनिक सेवा में जाए लेकिन जगजीत पर गायक बनने की धुन सवार थी। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान संगीत में उनकी दिलचस्पी देखकर कुलपति प्रोफेसर सूरजभान ने जगजीत सिंह जी को काफी प्रेरित किया और उनके कहने पर ही वह 1965 में मुंबई आ गए।

जगजीत सिंह पेइंग गेस्ट के तौर पर रहा करते थे और विज्ञापनों के लिए जिंगल्स गाकर या शादी-समारोह वगैरह में गाकर रोज़ी रोटी का जुगाड़ करते रहे। यहाँ से संघर्ष का दौर शुरू हुआ। इसके बाद फ़िल्मों में हिट संगीत देने के सारे प्रयास बुरी तरह नाकामयाब रहे। उसके बाद उन्होंने डिंपल कापड़िया और विनोद खन्ना अभिनीत फ़िल्म 'लीला' का संगीत औसत दर्ज़े का रहा। 

उनकी पहली एलबम 'द अनफॉरगेटेबल्स' (1976) हिट रही। 'झुकी झुकी सी नजर बेकरार है कि नहीं', 'तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो', 'तुमको देखा तो ये ख्याल आया', 'प्यार का पहला खत लिखने में वक्त तो लगता है', 'होश वालों को खबर क्या', 'कोई फरियाद', 'होठों से छू लो तुम', 'चिठ्ठी न कोई संदेश' जैसी फ़िल्मी गजलें पेश कीं और इन गंज़लों ने उन्हें गज़ल की दुनिया का बेताज बादशाह बना दिया।

खालिस उर्दू जानने वालों की मिल्कियत समझी जाने वाली गज़ल नवाबों, रक्कासाओं की दुनिया में झनकती और शायरों की महफ़िलों में वाह-वाह की दाद पर इतराती अवाम की दुनिया से कोसों दूर थी जिसे आम आदमी तक पहुंचाने का श्रेय अगर किसी को जाता है तो वह जगजीत सिंह हैं। उनकी इसी रचनात्मकता को देखते हुए 2003 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से नवाज़ा था। 10 अक्टूबर 2011 को उनका निधन हो गया। उनका गाया वह गीत उनके निधन के बाद उनपर बिल्कुल सटीक बैठता है – ‘चिट्ठी न कोई संदेश, जाने वो कौन सा देश, जहां तुम चले गये’


BY : Saheefah Khan




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