राष्ट्रीय - मोदी सरकार के ‘एजेंडे’ को लॉ कमीशन ने ठहराया गलत, कहा- पुनः विचार करे सरकार

मोदी सरकार के ‘एजेंडे’ को लॉ कमीशन ने ठहराया गलत, कहा- पुनः विचार करे सरकार



Posted Date: 01 Sep 2018

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नई दिल्ली। बोलने के अधिकार पर अपनी रिपोर्ट पेश करते हुए सरकार की नीतियों को आइना दिखाने के बाद अब लॉ कमीशन ने मोदी सरकार के एजेंडा में शामिल समान नागरिक संहिता के विचार को तगड़ा झटका दिया है। आयोग का कहना है कि मौजूदा दौर में समान नागरिक संहिता न तो आवश्यक है और न ही वांछनीय। हालांकि वर्तमान पर्सनल लॉ में सुधार की जरूरत है। धार्मिक रीति-रिवाजों और मौलिक अधिकारों के बीच सद्भाव बनाए रखने की आवश्यकता है।

खबरों के मुताबिक़ समान नागरिक संहिता के विचार पर आयोग ने कहा है कि फिलहाल देश में समान नागरिक संहिता की जरूरत नहीं है।

हालांकि आयोग ने विस्तृत परिचर्चा के बाद जारी कंसल्टेशन पेपर में विभिन्न धर्मों, मतों और आस्था के अनुयायियों के पर्सनल लॉ को संहिताबद्ध करने और उन पर अमल की जरूरत बताई है।

अपने कार्यकाल के अंतिम दिन विधि आयोग ने पारिवारिक कानून को लेकर कंसल्टेशन पेपर जारी किया। इसमें हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, पारसी सहित कई धर्मों के मुताबिक मान्य पर्सनल लॉ या धार्मिक नियमों के मुताबिक विवाह, संतान, दत्तक यानी गोद लेने, विवाह विच्छेद, विरासत और संपत्ति बंटवारा कानून जैसे मुद्दों पर अपनी राय रखी है।

समान नागरिक संहिता पर भारतीय विधि आयोग के कंसल्टेशन पेपर में आयोग ने सभी धर्मों के पर्सनल लॉ में सुधार की बात कही है।

आयोग ने कहा कि ट्रिपल तलाक सुप्रीम कोर्ट द्वारा अवैध बताया गया है। इसका विवाह पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। एकतरफा तलाक को घरेलू हिंसा अधिनियम, महिलाओं पर क्रूरता, और आईपीसी की धारा 498 के तहत दंडित किया जाना चाहिए। हालांकि रिपोर्ट ट्रिपल तलाक से निपटने के लिए किसी भी विशेष कानून की बात नहीं करती है।

वहीं ध्यान देने वाली बात यह है कि विधि आयोग की रिपोर्ट तीन तलाक की तुलना सती प्रथा, दासता, देवदासी और दहेज प्रथा के साथ करती है। ये न तो धार्मिक शिक्षा के साथ और न ही मौलिक अधिकारों के साथ समन्वयित है।

मुस्लिम विवाह और निकाहनामा को लेकर कंसल्टेशन पेपर में जिक्र किया गया है कि मुसलमानों के बीच प्रचलित संविदात्मक विवाह महिलाओं के लिए फायदेमंद है, लेकिन तभी जब अनुबंध वास्तव में बातचीत और पक्षों द्वारा सहमत है।

रिपोर्ट अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के मॉडल निकाहनामा और जीनत शौकत अली द्वारा लिखित भारत में विवाह और तलाक पुस्तक में दिखाए जाने पर विचार करने को लेकर है।

बहुविवाह को लेकर विधि आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि ये मुस्लिमों में आम नहीं है। मुस्लिमों में यह दुर्लभ है। लेकिन यह अन्य धर्म के लोगों के बीच ज्यादा प्रचलित है जो दूसरा या तीसरा विवाह करने के लिए इस्लाम में परिवर्तित हो जाते हैं। कई मुस्लिम देशों में बड़े पैमाने पर इस बारे में सख्त कानून है।

पाकिस्तान में ही इस संबंध में एक प्रावधान है जिसमें दूसरी शादी से पहले पहली पत्नी की सहमति अनिवार्य है। पहली पत्नी की सहमति के बिना, दूसरी शादी वहां एक अपराध है। इसलिए यह सुझाव दिया जाता है कि निकाहनामे में यह उल्लेख करना चाहिए कि बहुविवाह अपराध है। हालांकि, आयोग इसकी सिफारिश नहीं कर रहा है क्योंकि मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।

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कंसल्टेशन पेपर के मुताबिक विधि आयोग विशेष विवाह अधिनियम 1954 में परिवर्तन चाहता है। विवाह वैध होने से पहले विवाह करने वाले जोड़े के माता-पिता को 30 दिनों के लिए अनिवार्य नोटिस की मोहलत दी गई है।

आयोग की यह भी सिफारिश है कि 30 दिन के खंड को हटा दिया जाना चाहिए या जोड़े को सुरक्षा दी जानी चाहिए। माता-पिता द्वारा 30 दिनों की अवधि का दुरुपयोग किया जाता है जो अंतर-धार्मिक या अंतर-समुदाय विवाह का विरोध कर रहे हैं। यह धर्म परिवर्तन को भी बढ़ावा देता है जहां लोग सिर्फ शादी करने के लिए परिवर्तित होते हैं।

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वहीं विधि आयोग सभी धर्मों के अवैध बच्चों के लिए विशेष धर्मनिरपेक्ष कानून बनाने के लिए संसद को सिफारिश करता है। इन बच्चों को माता-पिता की अधिग्रहित संपत्ति विरासत में समान अधिकार मिलने चाहिए।


BY : Ankit Rastogi


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