विशेष - सियासत की बिसात पर भारी पड़ती ममता बनर्जी क्या पूरा होने देंगी मोदी का सपना?

सियासत की बिसात पर भारी पड़ती ममता बनर्जी क्या पूरा होने देंगी मोदी का सपना?



Posted Date: 06 Feb 2019

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ममता बनर्जी धरने पर क्या बैठीं पूरा का पूरा विपक्ष उनके समर्थन में उठ खड़ा हुआ। तेजस्वी यादव, कनिमोझी, चंद्रबाबू नायडू समेत दर्जनों नेता उनका हौसला बढ़ाने पहुंचे तो जो नहीं जा पाए वह भी उनसे सहानुभूति जताने लगे।

हाल के वर्षों में किसी भी मुद्दे, यहां तक कि रफ़ाल लड़ाकू विमान सौदे में कथित गड़बड़ी या नरेंद्र मोदी सरकार के अविश्वास प्रस्ताव पर, विपक्ष इतनी मज़बूती से एक साथ खड़ा नहीं दिखा है जितना की सीबीआई के गलत इस्तेमाल पर एक साथ खड़ा है। लोकसभा में बीजू जनता दल सांसद के भर्तहरि महताब ने सीबीआई के रवैए को 'ग़ैर-पेशेवर' बताया और केंद्र सरकार को याद दिलाया कि ये (भारत) अंधेर नगरी नहीं है।

नवीन पटनायक का बीजेडी हाल तक लगभग सभी मामलो में यहां तक कि विपक्षी एकता के मुद्दे पर भी तटस्थता बरतता रहा है। फ़िलहाल तेलंगाना राष्ट्र समीति के अलावा सभी विपक्षी दल और शिव सेना तक एकजुट हैं।

ये मामला इतना बड़ा बनकर उभरा है कि सोमवार को एनसीपी नेता शरद पवार के घर पर बैठक हुई जिसके बाद उन्होंने कहा कि जो ममता के साथ हुआ वो केजरीवाल के साथ दिल्ली में हो चुका है।

उधर ममता बनर्जी ने कहा कि उनकी लड़ाई कोलकाता पुलिस आयुक्त की नहीं बल्कि बंगाल की जनता की के लिए लड़ाई है। ममता ने यह भी आरोप लगाया कि उन्हें प्रधानमंत्री मोदी की तरफ से धमकी दी गई थी और उसके बाद सीबीआई के द्वारा उनको परेशान किया जा रहा है।

लेकिन ममता के इस कदम से पूरे देश का फोकस मेट्रो चैनल की तरफ मुड़ गया। जिसको सियासी गलियारों में ममता की चुनाव दांव माना जा रहा है। अपने इस कदम से उन्होंने राष्ट्रीय नेता की दावेदारी को मज़बूत किया है।

इससे पहले ममता बनर्जी दिसंबर 2006 में मैट्रो चैनल पर टाटा समूह की सिंगूर फैक्ट्री के खिलाफ धरने पर बैठी थीं और उसके बाद वो प्रदेश की मुखिया बनी थी और अब दूसरी बार सूबे की मुख्यमंत्री की कुर्सी पर हैं तो आलोचकों का कहना है उनकी नज़र पीएम कुर्सी पर टिकी है।

लेकिन अगर बंगाल की स्थिति का आंकलन किया जाए तो यह सवाल खड़ा होता है कि ममता बनर्जी ने जो किया वो उनकी मजबूरी तो नहीं? क्योंकि सूबे में पैठ बना रही बीजेपी से ममता बनर्जी घबराई हुई हैं। प्रदेश में कांग्रेस कमज़ोर पड़ चुकी है, वामपंथी दलों के ज़मीनी लोग ममता के दल में शामिल हो चुके हैं तो जनता को भी एक विपक्ष की तलाश है जो उसे बीजेपी में दिख रही है।

दूसरी तरफ बीजेपी के लिए इस बार उत्तर प्रदेश, बिहार और हिंदी पट्टी के दूसरे राज्यों में सीटों की तादाद को और बढ़ाना मुश्किल है बल्कि कहा तो ये जा रहा है कि वो घटेगी तो उसकी भरपाई वो पश्चिम बंगाल और ओडीशा जैसे राज्यों से करना चाहती है।

ऐसे में राष्ट्रीय दावेदारी का सपना देख रही ममता में घबराहट देखने को मिल रही है। उस ममता मे जिसे लोग जुझारु और राजनीति का धुरंधर मानते हैं। अब देखना यह दिलचस्प होगा कि बंगाल की जनता राजनीति के ऊंट को किस करवट बिठाती है। लेकिन उन्होंने यह साबित कर दिया कि विपक्ष को एकजुट करने की उनके पास अभूतपूर्व ताकत है।


BY : Saheefah Khan




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