विशेष - मोदी सरकार ने दिखाए अच्छे दिन के सपने, हकीकत में पूरे हुए क्या?

मोदी सरकार ने दिखाए अच्छे दिन के सपने, हकीकत में पूरे हुए क्या?



Posted Date: 07 Feb 2019

3605
View
         

लखनऊ। साल 2014 में मोदी सरकार इस वादे के साथ सत्ता की कुर्सी पर विराजमान हुई थी कि अच्छे दिन आने वाले हैं। समय-समय पर इस बात की चर्चा भी हुई कि क्या असल में भारत के अच्छे दिन आए? क्या मोदी सरकार द्वारा चुनाव प्रचार के दौरान किए हुए सभी वादे पूरे हुए? क्या देश में गरीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगारी, व्यवसाय, कृषि जैसी विभिन्य समस्याएं खत्म हुईं?

इस दौरान कई मायनों में यह नारा सच के करीब पहुंचा तो कई मायनों में यह केवल एक सपना ही रह गया खास तौर से गरीबी और बेरोजगारी दूर करने की जो बातें की जा रही थीं वह हकीकत से काफी दूर थीं। जोकि आज भी काफी हद तक जस को तस हैं। कुछ ऐसी ही समस्याओं पर आज नज़र डालें तो देखने को मिलता है कि मोदी सरकार अपने वादों को कुछ हद तक तो पूरा करने में सफल रहीं लेकिन अच्छे दिन की बात करें तो आज यह मजाक जैसा प्रतीत होता है...

2 करोड़ युवाओं के अच्छे दिन?

मोदी सरकार ने 2014 से पहले युवाओं से रोजगार का वादा किया था। इसके लिए सरकार स्किल इंडिया और मेक इन इंडिया जैसे कार्यक्रमों को लेकर आई। लेकिन युवाओं को इस सरकार से जितनी उम्मीदें थीं, वो पूरी नहीं हो पाईं। विपक्ष का दावा है कि खुद नरेंद्र मोदी ने अपने चुनावी भाषण के दौरान जनता से यह वादा किया था कि अगर हम सत्ता में आएंगे तो प्रत्येक वर्ष 2 करोड़ युवाओं को रोजगार देंगे। लोगों ने उन पर विश्वास किया और 2014 लोकसभा चुनाव में उन्हें जीत का तोहफा दिया। लेकिन सत्ता में आते ही मोदी ने युवाओं के साथ विश्वासघात किया औऱ उन्हें किसी प्रकार का रोजगार नहीं मिला।

क्या आंकड़ों से दूर होगी गरीबी?

मोदी सरकार दावा करती है कि देश में गरीबी कम हुई है और पिछले कुछ वर्षों में गरीबों के विकास के लिए सार्थक प्रयास किये गये हैं। लेंकिन गरीबों और अमीरों के बीच पनपे अंतराल को देखें तो यह नज़र आता है कि अमीर और अमीर होता जा रहा है और गरीब और गरीब। ग्रामीण इलाकों में भूख से लोग दम तोड़ रहे हैं। क्या ऐसी तस्वीरों के बीच भारत विश्वशक्ति बन पाएगा? जहां के लोग भरपेट भोजन के लिए आज भी तरस रहे हैं। जब ऐसी तस्वीर आती है तो फिर डिजिटल इंडिया, स्किल इंडिया जैसी और तमाम हाईटेक की बातें झूठी लगती हैं।

हालांकि सरकार गरीबी दूर करने की हमेशा से दंभ भरती रही है। मोदी सरकार की मानें तो हर मिनट में 44 लोग गरीबी रेखा से बाहर आ रहे हैं और अगर इसी रफ्तार से आंकड़े आगे बढ़ते रहे तो 2022 के बाद देश में केवल 3 फीसदी लोग गरीबी रेखा के नीचे बच जाएंगे। लेकिन सच बात तो यह है कि आंकड़ों से गरीबी को नहीं मिटाया जा सकता है। इसके लिए गरीबों का विकास और उन्हें सार्थक इससे उबरने के लिए सार्थक मदद की आवश्यकता होती है।

अन्नदाता सड़कों पर क्यों?

पांच साल पहले भी कृषि प्रधान देश में सबसे परेशान और चिंतित वर्ग किसान था। चुनावी भाषण में सत्ता पक्ष औऱ विपक्ष के बीच इसके लेकर खूब हो हल्ला सुनाई पड़ता था। वर्तमान में भी ऐसा देखने को मिल रहा है। अगर कोई यह कहता है कि आज ऐसा नहीं है, तो उससे सवाल है कि देश का अन्नदाता आज भी प्रदर्शन के लिए क्यों मजबूर है। सबका पेट भरने वालों को आखिर क्यों सरकार को जगाने की जरूरत पड़ती है। सच यह भी है कि हमेशा से किसानों की मांग को गंभीरता से नहीं लिया। मोदी सरकार में भी किसानों मे अंसतोष है और वो लगातार जगह-जगह अपनी मांगों को लेकर संघर्षरत हैं।

बदहाल अस्‍पताल, दम तोड़ते मरीज

वैसे तो मोदी सरकार ने आयुष्‍मान भारत के जरिए गरीबी से जूझ रहे एक बहुत बड़े तबके को फ्री इलाज की सुविधा दी है। लेकिन देश के अलग-अलग राज्‍यों में सरकारी अस्‍पतालों की बदहाली और उनकी लापरवाही जानलेवा साबित हुई है। इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता। डॉक्‍टरों की लापरवाही का ही नतीजा है कि अगस्‍त 2017 में उत्तर प्रदेश के गोरखपुर स्थित बीआरडी मेडिकल कॉलेज में पर्याप्त संख्या में ऑक्‍सीजन सिलेंडर का स्टॉक नहीं रखा गया। अंजाम यह हुआ कि ऑक्सीजन की कमी ने 60 से अधिक मासूमों ने सांसे छीन ली।

सरकारी अस्पतालों की बदहाली का एक उदाहरण पिछले साल उत्तर प्रदेश के पड़ोसी राज्य बिहार से भी देखने को मिला। जब यहां बारिश की वजह से एक सरकारी अस्पताल के आईसीयू में मछलियां तैरने लगीं। साफ शब्दों में कहें तो आज भी आम आदमी को समुचित इलाज के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।

शिक्षा का बंटाधार

पिछले पांच साल में हर बजट में शिक्षा पर अतिरिक्त रकम का प्रावधान किया गया, ताकि इस क्षेत्र में व्यापक सुधार के जरिए देश को भविष्य को संवारा जा सका। लेकिन जमीनी स्तर पर बड़ा बदलाव नहीं दिख रहा है। ये वही देश है जहां शून्य का अविष्कार हुआ था। लेकिन आज के दौर में शिक्षा के स्तर पर तमाम कोशिशों के बावजूद हालात ज्यों के त्यों हैं। 'सबको मिले शिक्षा का अधिकार' जैसे नारे बैनर-पोस्टर में तो दिखते हैं, लेकिन गांव की गलियों तक इनकी आवाज नहीं पहुंच पा रही है। जब बारिश के दिनों में स्कूल की छत से पानी टपकता है और बच्चों की छुट्टी कर दी जाती है तो विकास के सारे वादे खोखले साबित होते हैं। जब छात्र को पास कराने के लिए परिजन स्कूल की दीवारों पर लटक जाते हैं तो सारा सच सामने आ जाता है।

कब आएगा कालाधन?

पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने कालेधन के खिलाफ बड़ी मुहिम छेड़ दी थी और कटघरे में यूपीए सरकार थी। लेकिन एनडीए सरकार में कालेधन के खिलाफ कोई बड़ी कामयाबी हाथ नहीं लगी है। विपक्ष का सीधा कहना है कि कालेधन के खिलाफ सरकार का वादा एक जुमला था। वहीं आम आदमी को भी मोदी सरकार से कालेधन के खिलाफ कार्रवाई की उम्मीद थी। जो वक्त से साथ-साथ कम होती गई और आज फिर देश चुनाव के मुहाने पर खड़ा है और कालेधन का मुद्दा केवल मुद्दा बनकर रह गया है। लोगों को भी लगने लगा है कि विदेशों में जमा कालाधन अब कभी वापस नहीं आएगा।


BY : shashank pandey




Loading...




Loading...