विशेष - रमज़ान पर राजनीति...

रमज़ान पर राजनीति...



Posted Date: 13 Mar 2019

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लोकसभा चुनाव को भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा पर्व कहा जाता है। पांच साल में एक बार पड़ने वाला यह पर्व इस बार 11 अप्रैल से शुरु हो रहा है, जिसे मनाने के लिए भारत की करीब 90 करोड़ जनता उत्साहित है। इस बीच कुछ राजनीतिक दलों व उनके नेताओं ने इस महापर्व को धार्मिक चश्मे से देखना और इसका धार्मिक बंटवारा करना शुरु कर दिया है। ऐसे नेताओं ने इसके लिए रमज़ान के पावन महीने को अपना हथियार बनाया है और यह सवाल उठाना शुरु कर दिया है कि लोकसभा चुनाव रमजान के दौरान ही क्यों संपन्न कराया जा रहा है? इस सवाल के पीछ नेताओं का तर्क है कि अप्रैल-मई के दौरान आम चुनाव है और इस दौरान देश के अधिकतर इलाकों में भीषण गर्मी होती है। ऐसे में अधिकतर मुसलमान, जो रोज़े से होगा वह मतदान नहीं कर सकेगा। यानी जानबूझकर मुस्लिमों के वोट काटने के लिए अप्रैल-मई के महीने का चुनाव किया गया है।

दबाव में चुनाव आयोग!

कुछ दल व उनके नेताओं ने तो यह भी आरोप लगाना शुरु कर दिया है कि निर्वाचन आयोग जैसी संवैधानिक संस्था सत्ताधारी दल (बीजेपी) के दबाव में आकर ऐसे समय चुनाव करा रही है, जब रमजान पड़ रहा है। ऐसे नेता कहते हैं कि उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में बड़ी संख्या में मुस्लिम आबादी रह रही है। चूंकि बीजेपी को मुस्लिमों के वोट हासिल नहीं होते हैं, इसलिए वह रमजान के समय मतदान कराकर अधिकतर मुस्लिम मतदाताओं को वोट करने से रोकना चाहती है। लेकिन यहां पर सवाल उठता है कि क्या रमजान के दौरान मुसलमान अपने सभी कार्यों को रोक देते हैं। अगर नहीं, तो फिर इस मुद्दे को उठाने का क्या तुक बनता है।

तर्क और प्रमाणिकता

वास्तव में अगर इस मुद्दे की संवेदनशीलता पर गौर करें तो यह साफ ज़ाहिर होता है कि राजनीतिक दलों द्वारा उठाया जा रहा यह विषय बिना सिर पैर का है। इस बेबुनियादी मुद्दे को उठाकर राजनीतिक पार्टियां धर्म और समुदाय के नाम पर केवल वोट की राजनीति कर रही हैं। चुनाव आयोग एक निष्पक्ष संवैधानिक संस्था है और उसे किसी भी पार्टी से कोई मतलब नहीं होता। हालांकि विपक्ष इस पर भी सवाल खड़े करने लगा है। कभी सुप्रीम कोर्ट, कभी सीबीआई तो कभी चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल खड़े करना तो नेताओं की आदत बन चुकी है। राजनीति की आड़ में देश की संवैधानिक संस्थाओं पर अविश्वास जताकर एक तरह से लोकतंत्र को तिरस्कृत किया जा रहा है।

इन दलों के समझना चाहिए कि बेबुनियादी मुद्दों को चुनाव में उठाकर वह सिर्फ जनता को सिर्फ भ्रमित कर सकता है। एक बार तो इसका लाभ भी मिल सकता है, परन्तु झूठ पर की गई राजनीति का आधार अधिक नहीं होता है। ऐसे में उसकी नींव कभी भी हिल सकती है। ऐसे में इन पार्टियों को चुनाव प्रचार के लिए बेरोज़गारी, गरीबी, शिक्षा और अन्य विकासपरक विषयों को उठाना चाहिए और सत्ता पक्ष को इन मुद्दों के भीतर ही घेरना चाहिए।


BY : shashank pandey




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