विशेष - भारतीय राजनीति में हावी पुरुषवादी मानसिकता में प्रिंयका खुद को साबित कर पाएंगी कि वह आधुनिक भारत की सशक्त महिला हैं?

भारतीय राजनीति में हावी पुरुषवादी मानसिकता में प्रिंयका खुद को साबित कर पाएंगी कि वह आधुनिक भारत की सशक्त महिला हैं?



Posted Date: 10 Feb 2019

4698
View
         

हम इक्कीसवीं सदीं के उस दौर में कदम रख चुके हैं जहां महिला सशक्तिकरण एक गंभीर और सुलगता हुआ मुद्दा है। हर व्यक्ति महिला सश्कितकरण और महिलाओं की स्थिति को सुधारने की बात करता हुआ दिखलाई पड़ जाता है। ज़मीन से लेकर चांद तक कोई ऐसा क्षेत्र नहीं बचा है जहां महिलाओं की भागीदारी न हो और वह अपने काम को सफलतापूर्वक अंजाम देते हुए न दिखाई दें। बल्कि यह भी देखने में आता है कि महिलाएं पुरुषों से बेहतर काम करती हैं।

लेकिन जब हम अपने देश भारत का आंकलन करने बैठते हैं तो स्थिति इसके एकदम उलट दिखलाई पड़ती है। यहां की पुरुषवादी मानसिकता में अभी तक कोई भी बदलाव नज़र नहीं आता। इसका ताज़ा उदाहरण है ‘प्रियंका गांधी वाड्रा।’ उनके औपचारिक रुप से राजनीति में कदम रखते ही चारों तरफ से आलोचनाओं की बौछार होने लगी।

और आलोचनाओं के एक-एक शब्द से पुरुषवादी मानसिकता झलक रही थी। किसी ने कहा ‘अब राहुल से काम नहीं हो सकता तो बहन का सहारा ले रहें..’ किसी ने कहा ‘कांग्रेस अब ग्लैमर्स की पार्टी बन चुकी है।‘ ‘किसी ने कहा लोक सभा चुनाव में कांग्रेस चॉकलेट जैसे चेहरे सामने ला रही है’, तो कोई महाशय गंभीर राजनीति की बात करते हुए यह कह गए कि ‘वोट चेहरों की सुंदरता के बल पर नहीं जीते जा सकते।’ अरे सुंदरता का मतलब यह कैसे हो सकता कि सुंदर इंसान गंभीर या बुद्धिमान नहीं हो सकता?

वास्तव में यह विपक्ष की आलोचना नहीं बल्कि पुरुषवादी मानसिकता है जो इतने सालों बाद भी बदली नहीं है। उन्हें केवल यह लगता है कि औरत सुंदर है तो वह बुद्धिमान नहीं हो सकती या यह कह सकते हैं कि औरत का काम राजनीति करना नहीं है। प्रिंयका गांधी की आलोचना ठीक उसी तरह है जिस तरह इंदिरा गांधी ने राजनीति में कदम रखा तो उनको गूंगी गुड़िया कहा जाने लगा था। जबकि बाद में इंदिरा ने साबित कर दिया कि वह आधुनिक भारत की ऐसी महिला हैं जिसे कम आंकना अविकसित बुद्धि का सबूत है।

इंदिरा गांधी ने तो यह साबित कर के दिखा दिया कि भारत की बेटी कुछ भी कर सकती है लेकिन अफसोस कि आज भी पुरषप्रधान समाज वहीं का वहीं खड़ा है जबकि इंदिरा से प्रियंका के दौर तक दुनिया ने अनेकों परिवर्तन के दौर देख लिए लेकिन हमारे देश में केवल इतना परिवर्तन हुआ कि पहली लोकसभा में 4 फ़ीसदी महिलाओं की भागीदारी थी जो बढ़कर 16वीं लोकसभा में क़रीब 12 फ़ीसदी हो गई। जबकि अगल बगल नज़र दौड़ायें तो पड़ोसी देश नेपाल में 38 फीसद महिला सांसद हैं और पाकिस्तान में 20 फीसद महिला सांसद हैं।

प्रियंका को भी उसी प्रकार अपने आप को साबित करना होगा जिस प्रकार उनकी दादी ने खुद को साबित किया था। हालांकि परिवर्तन केवल इतना हुआ है कि समाज ने आधुनिक चोला ओढ़ लिया है लेकिन मानसिकता वही है जो इंदिरा गांधी के समय थी। ऐसे में प्रिंयका गांधी को दिखाना होगा कि चेहरे के अलावा व्यक्ति के पास एक तार्किक मस्तिष्क भी होता है और उस मस्तिष्क के आधार पर व्यक्ति का आंकलन होना चाहिए चाहे वह खूबसूरत हो या बदसूरत, महिला हो या पुरुष।


BY : Saheefah Khan




Loading...




Loading...