अंतरराष्ट्रीय - राफेल पर कठघरे में मोदी सरकार, राहुल के आरोपों को मिला फ्रांस मीडिया का समर्थन

राफेल पर कठघरे में मोदी सरकार, राहुल के आरोपों को मिला फ्रांस मीडिया का समर्थन



Posted Date: 31 Aug 2018

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पेरिस। राफेल डील के मुद्दे पर इन दिनों भारत में घमासान मचा हुआ है। कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही पार्टियों के बीच मामले को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला जारी है। ऐसे में अब इस मामले में फ्रांस मीडिया ने भी राफेल विवाद की तुलना बोफोर्स घोटाले से कर हलचल मचा दी है। 1980 के दशक में हुए बोफोर्स घोटाले के चलते उस वक्त की मौजूदा कांग्रेस सरकार को सत्ता से हाथ धोना पड़ा था। वहीं हालिया वक्त में निशाने पर मोदी सरकार है। फ्रांस के मुख्य अखबार फ्रांस 24 ने राफेल डील पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए कहा है कि 2007 में शुरु हुई इस डील से आखिर 2015 में हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड यानि कि HAL बाहर कैसे हो गया। इस अनुभवी कंपनी को छोड़कर आखिर यह डील रिलायंस डिफेंस के साथ कैसे फाइनल हो गई।

जानिए क्या कहती है फ्रांस 24 की रिपोर्ट

मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक, फ्रांस मीडिया ने दावा किया कि भारत में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने एक अन्य फ्रांसीसी अखबार को दिए इंटरव्यू में सवाल खड़ा किया कि आखिर किस आधार पर इस डील से एक अनुभवी कंपनी को बाहर करते हुए एक ऐसी कंपनी को जगह दी गई जिसने इस क्षेत्र में कभी काम नहीं किया। इसके साथ ही फ्रांस 24 ने भी दावा किया कि दसॉल्ट ने जिस भारतीय कंपनी को एचएएल की अपेक्षा तरजीह दी उस कंपनी को इस डील से महज 15 दिन पहले ही स्थापित किया गया। खासबात यह है कि कंपनी को स्थापित करने की यह तारीख प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के फ्रांस दौरे से महज 13 दिन पहले की है। वहीं फ्रांस 24 ने यह मुद्दा भी उठाया है कि प्रधानमंत्री की इस यात्रा में शामिल कारोबारियों ने अनिल अंबानी भी मौजूद थे।

फ्रांस 24 की रिपोर्ट के अनुसार, डील में हुआ एक अहम बदलाव सबको चौंकाने वाला था। भारत में एचएएल के पास रक्षा क्षेत्र में मैन्यूफैक्चरिंग का 78 साल का तजुर्बा था और वह इस ऑफसेट क्लॉज में एक मात्र कंपनी थी जिसके पक्ष में फैसला किया जाता। लेकिन दसॉल्ट ने एचएएल से करार तोड़ते हुए अनिल अंबानी की रिलायंस ग्रुप से करार कर लिया। खासबात यह है कि इस वक्त तक रिलायंस के पास रक्षा क्षेत्र की मैन्यूफैक्चरिंग तो दूर उसे एविएशन सेक्टर का भी कोई तजुर्बा नहीं था।

फ्रांस 24 के अनुसार, राफेल डील का आरंभ 2007 में हुआ था। उस दौरान भारतीय रक्षा मंत्रालय ने अपना सबसे बड़ा टेंडर जारी किया था। जिसके तहत भारत को 126 मल्टी रोल लड़ाकू विमान खरीदने थे। इसी क्रम में 5 साल तक चली बातचीत के बाद मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने ऐलान किया कि फ्रांसीसी कंपनी दसॉल्ट को रक्षा मंत्रालय की तरफ से यह टेंडर दिया गया है। दसॉल्ट राफेल की मैन्यूफैक्चरिंग करता है और 2012 के इस समझौते के मुताबिक रक्षा मंत्रालय सेवा में तुरंत तैनात करने के लिए 18 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद फ्रांसीसी कंपनी से करेगा। वहीं बचे हुए 108 लड़ाकू विमानों की असेंब्ली दसॉल्ट भारत सरकार की कंपनी हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड के साथ मिलकर भारत में करेगा।

फ्रांस 24 के मुताबिक कांग्रेस सरकार की यह डील कीमत और क्षमता पर विवाद के चलते अगले तीन साल तक और लटकी रही। जहां शुरुआत में यह डील महज 12 बिलियन डॉलर की थी वह अब यह बढ़कर 20 बिलियन डॉलर पर पहुंच गई। कीमत में इजाफा इस आधार पर हुआ कि भारत सरकार की कोशिश कुछ लड़ाकू विमानों को भारत में ही निर्मित कराने की थी।

इसके बाद भारत में मई 2014 में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार बनी। अपने कार्यकाल के पहले वर्ष के अंत में प्रधानमंत्री मोदी फ्रांस के दौरे पर गए और फ्रांसीसी कंपनियों को मेक इन इंडिया कार्यक्रम के तहत भारत के साथ करार करने का निमंत्रण दिया। मोदी ने यह निमंत्रण सिविल न्यूक्लियर एनर्जी, डिफेंस और फूड प्रोसेसिंग क्षेत्र की फ्रांसीसी कंपनियों को दिया।

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अपने इसी दौरे पर प्रधानमंत्री मोदी ने पेरिस से डील का ऐलान किया। हालांकि नई डील के मुताबिक अब भारत को महज 36 लड़ाकू विमान खरीदने थे। लिहाजा पूरी डील पर सरकार को सिर्फ 8.7 बिलियन डॉलर खर्च करने थे। इस डील की खासबात यह थी कि सभी के सभी 36 लड़ाकू विमानों को फ्रांस में ही निर्मित किया जाएगा और तैयार विमान भारत को सौंपे जाएंगे।

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इस डील के साथ ही भारत और फ्रांस की सरकार के बीच समझौता किया गया कि इस डील से दसॉल्ट को हुई कुल कमाई का आधा हिस्सा कंपनी को एक निश्चित तरीके से वापस भारत में निवेश करना होगा। डील के इस पक्ष को ऑफसेट क्लॉज कहा गया। लिहाजा, डील के तहत दसॉल्ट को यह सुनिश्चित करना था कि वह 8.7 बिलियन डॉलर की आधी रकम को वापस भारत के रक्षा क्षेत्र में निवेश करे। फ्रांस 24 के मुताबिक, वर्तमान समय में भारत में 2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों में राफेल मसला वही भूमिका अदा कर सकता है, जोकि 1980 के दौरान बोफोर्स घोटाले ने की थी। आपको बता दें कि 1980 के चुनावों में बोफोर्स घोटाले के मुद्दे के चलते ही उस दौर की कांग्रेस सरकार को सत्ता से बाहर होना पड़ा था।


BY : INDRESH YADAV


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