विशेष - तिलका मांझी : देश के लिए कुर्बान होने वाले सबसे पहले व्यक्ति, उनके साहस ने अंग्रेज़ो के छक्के छुड़ा दिए

तिलका मांझी : देश के लिए कुर्बान होने वाले सबसे पहले व्यक्ति, उनके साहस ने अंग्रेज़ो के छक्के छुड़ा दिए



Posted Date: 11 Feb 2019

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11 फरवरी 1750 को जन्में तिलका मांझी वह स्वतंत्रता सेनानी थे जिनके नाम स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई सबसे पहले शहीद होने का रिकार्ड दर्ज है। अंग्रेज़ी शासन की बर्बरता के विरुद्ध उन्होंने ज़ोरदार तरीके से आवाज़ उठायी थी। और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में रुह फूंकने का काम भी उन्होंने किया। जिसके कारण अंग्रेज़ो ने उन्हें फांसी दे दी।

बिहार के सुल्तानगंज में तिलकपुर नामक गांव में एक संथाल परिवार में जन्में तिलका मांझी को जाबरा पहाड़िया के नाम से भी जाना जाता था। बचपन से ही तिलका मांझी जंगली सभ्यता की छाया में धनुष-बाण चलाते और जंगली जानवरों का शिकार करते। कसरत, कुश्ती करना. बड़े-बड़े वृक्षों पर चढ़ना उतरना, बीहड़ जंगलों, नदियों, भयानक जानवरों से छेड़खानी, घाटियों में घूमना आदि उनके शौक थे। इन्हीं शौक ने उन्हें निडर व वीर बना दिया था।

किशोर जीवन से ही अपने परिवार तथा जाति पर उन्होंने अंग्रेज़ी सत्ता का अत्याचार देखा था। अनाचार देखकर उनका रक्त खौल उठता और अंग्रेज़ी सत्ता से टक्कर लेने के लिए उनके मस्तिष्क में विद्रोह की लहर पैदा होती। ग़रीब आदिवासियों की भूमि, खेती, जंगली वृक्षों पर अंग्रेज़ी शासक अपना अधिकार किये हुए थे। जंगली आदिवासियों के बच्चों, महिलाओं, बूढ़ों को अंग्रेज़ कई प्रकार से प्रताड़ित करते थे।

आदिवासियों के पर्वतीय अंचल में पहाड़ी जनजाति का शासन था। वहां पर बसे हुए पर्वतीय सरदार भी अपनी भूमि, खेती की रक्षा के लिए अंग्रेज़ी सरकार से लड़ते थे। पहाड़ों के इर्द-गिर्द बसे हुए ज़मींदार अंग्रेज़ी सरकार को धन के लालच में खुश किये हुए थे। आदिवासियों और पर्वतीय सरदारों की लड़ाई रह-रहकर अंग्रेज़ी सत्ता से हो जाती थी और पर्वतीय ज़मींदार वर्ग अंग्रेज़ी सत्ता का खुलकर साथ देता था।

अंततः वह दिन भी आ गया, जब तिलका माँझी ने 'बनैचारी जोर' नामक स्थान से अंग्रेज़ो के विरुद्ध विद्रोह शुरू कर दिया। वीर तिलका मांझी के नेतृत्व में आदिवासी वीरों के विद्रोही कदम भागलपुर, सुल्तानगंज तथा दूर-दूर तक जंगली क्षेत्रों की तरफ बढ़ रहे थे। राजमहल की भूमि पर पर्वतीय सरदार अंग्रेज़ी सैनिकों से टक्कर ले रहे थे। स्थिति का जायजा लेकर अंग्रेज़ों ने क्लीव लैंड को मैजिस्ट्रेट नियुक्त कर राजमहल भेजा। क्लीव लैंड अपनी सेना और पुलिस के साथ चारों ओर देख-रेख में जुट गया। हिंदू-मुस्लिम में फूट डालकर शासन करने वाली ब्रिटिश सत्ता को तिलका माँझी ने ललकारा और विद्रोह शुरू कर दिया।

जंगल, तराई तथा गंगा, ब्रह्मी आदि नदियों की घाटियों में तिलका माँझी अपनी सेना लेकर अंग्रेज़ी सरकार के सैनिक अफसरों के साथ लगातार संघर्ष करते-करते मुंगेर, भागलपुर, संथाल परगना के पर्वतीय इलाकों में छिप-छिप कर लड़ाई लड़ते रहे। क्लीव लैंड एवं सर आयर कूट की सेना के साथ वीर तिलका की कई स्थानों पर जमकर लड़ाई हुई। वे अंग्रेज़ सैनिकों से मुकाबला करते-करते भागलपुर की ओर बढ़ गए। वहीं से उनके सैनिक छिप-छिपकर अंग्रेज़ी सेना पर अस्त्र प्रहार करने लगे। समय पाकर तिलका माँझी एक ताड़ के पेड़ पर चढ़ गए। ठीक उसी समय घोड़े पर सवार क्लीव लैंड उस ओर आया। इसी समय राजमहल के सुपरिटेंडेंट क्लीव लैंड को तिलका माँझी ने 13 जनवरी, 1784 को अपने तीरों से मार गिराया। क्लीव लैंड की मृत्यु का समाचार पाकर अंग्रेज़ी सरकार डांवाडोल हो उठी। सत्ताधारियों, सैनिकों और अफसरों में भय का वातावरण छा गया।

एक रात तिलका माँझी और उनके क्रान्तिकारी साथी, जब एक उत्सव में नाच गाने की उमंग में खोए थे, तभी अचानक एक गद्दार सरदार जाउदाह ने संथाली वीरों पर आक्रमण कर दिया। इस अचानक हुए आक्रमण से तिलका माँझी तो बच गये, किन्तु अनेक देश भक्तवीर शहीद हुए। कुछ को बन्दी बना लिया गया। तिलका माँझी ने वहां से भागकर सुल्तानगंज के पर्वतीय अंचल में शरण ली। भागलपुर से लेकर सुल्तानगंज व उसके आसपास के पर्वतीय इलाकों में अंग्रेज़ी सेना ने उन्हें पकड़ने के लिए जाल बिछा दिया।

वीर तिलका माँझी एवं उनकी सेना को अब पर्वतीय इलाकों में छिप-छिपकर संघर्ष करना कठिन जान पड़ा। अन्न के अभाव में उनकी सेना भूखों मरने लगी। अब तो वीर माँझी और उनके सैनिकों के आगे एक ही युक्ति थी कि छापामार लड़ाई लड़ी जाये। तिलका माँझी के नेतृत्व में संथाल आदिवासियों ने अंग्रेज़ी सेना पर प्रत्यक्ष रूप से धावा बोल दिया। युद्ध के दरम्यान तिलका माँझी को अंग्रेज़ी सेना ने घेर लिया। अंग्रेज़ी सत्ता ने इस महान् विद्रोही देशभक्त को बन्दी बना लिया और 1785 में फांसी दे दी गई।

उनका देश के लिए दिया गया बलिदान बेकार नहीं गया बल्कि उनकी शहादत के 90 साल बाद 1857 में स्वतंत्रता संग्राम की ज्वाला फूट पड़ी और फिर शांत नहीं हुई आखिरकार अंग्रेज़ो को 1947 में देश को आज़ाद करना ही पड़ा।


BY : Saheefah Khan




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