विशेष - लोकसभा चुनाव 2019 : कोई कसर न रह जाए बाकी...क्योंकि दिल्ली की सियासत का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर गुज़रता है

लोकसभा चुनाव 2019 : कोई कसर न रह जाए बाकी...क्योंकि दिल्ली की सियासत का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर गुज़रता है



Posted Date: 10 Mar 2019

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लोकसभा चुनाव का बिगुल बजने ही वाला है। सारी पार्टियां चुनावी जंग में कूदने को कमर कस चुकी हैं। आरोप प्रत्यारोप का दौर भी बड़ी तेज़ी से बढ़ने लगा है जैसे हर चुनाव से पहले होता है। टिकट के दावेदार अपने अपने पत्ते फेंकने में व्यस्त हैं। आम जनता भी लोकतंत्र के उत्सव को मनाने के लिए पूरी तरह से तैयार है। अर्थात अगले दो तीन महीनों के लिए पूरा देश बिज़ी है।

ऐसे में ज़रा नज़र डालते हैं उत्तर प्रदेश के राजनीतिक समीकरण पर। माना जाता है कि दिल्ली की सियासत का रास्ता उत्तर प्रदेश से ही होकर जाता है। इसीलिए सभी राजनीतिक पार्टियां जनता को लुभाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सारी ताकत उत्तर प्रदेश में झोंक दी है। उन्होंने ताबड़तोड़ उद्घाटन और शिलान्यास करना शुरु कर दिया है ताकि मतदाताओं को अपने पक्ष में किया जा सके। उत्तर प्रदेश भाजपा के लिए खास है क्योंकि पिछले आम चुनाव में पार्टी ने यहां से 73 सीटों पर जीत दर्ज की थी और केंद्र की सत्ता पर काबिज़ हुई थी।

यही कारण है कि मोदी फरवरी और मार्च में अब तक राज्य में 102,708 करोड़ रुपये से अधिक की परियोजनाओं का शिलान्यास या लोकार्पण कर चुके हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने उप्र की धरती के सियासी महत्व को देखते हुए फरवरी, मार्च में राज्य का तूफानी दौरा किया है। इस दौरान उन्होंने 102,708 करोड़ रुपये से अधिक की परियोजनाओं का शिलान्यास या लोकापर्ण किया है।

दरअसल, प्रधानमंत्री उत्तर प्रदेश की 80 सीटों को ध्यान में रखकर यहां अपने चुनावी चौसर की बिसात बिछाने में लगे हुए हैं, और पूर्वांचल इस लिहाज़ से उनके लिए महत्वपूर्ण है। यही कारण है कि बड़ी योजनाओं की शुरुआत उन्होंने यहीं से की है।

सपा-बसपा गठबंधन का असर सबसे अधिक पूर्वांचल में है। जातियों की गोलबंदी बहुत बड़ा फैक्टर है। ऐसे में नरेंद्र मोदी ने उज्जवला योजना और किसान निधि सम्मान योजना दोनों की शुरुआत यहीं से की क्योंकि सबसे ज़्यादा लाभार्थी भी यहीं से आते हैं और इससे उन्हें फायदा भी मिल सकता है।

उत्तर प्रदेश की सियासत को भांप इस बार नरेंद्र मोदी ने दो फार्मूले अपनाए हैं और यह दोनो ही फार्मूले ज़ोर पकड़ रहे हैं। एक है विकास और दूसरा राष्ट्रवाद। राष्ट्रवाद का मुद्दा पुलवामा हमले के बाद से ज़ोर पकड़ रहा है। योजनाओं के लोर्कापण और शिलान्यास के ज़रिए वह अपनी विकास वाली तस्वीर मज़बूत कर रहे हैं। क्योंकि उनको पता है केंद्र का रास्ता उत्तर प्रदेश से खुलता है।

हालांकि उत्तर प्रदेश के वोटर अलग अलग तबकों में बंटे हुए हैं। दलित बहुजन समाज पार्टी के खेमे मे दिखाई देते हैं तो मुसलमान समाजवादी पार्टी के साथ। हां ब्राहमणों ने बीजेपी को अपनी पार्टी बना लिया है। सपा-बसपा गठबंधन से मुस्लिम दलित वोट एक तरफा गठबंधन की ओर जाते दिख रहे हैं और इसी वजह से भारतीय जनता पार्टी की लड़ाई चुनौतीपूर्ण हो गई है। उस पर परीक्षा को अधिक कठिन बना दिया है कांग्रेस पार्टी ने।

कांग्रेस ने प्रियंका गांधी को सक्रिय राजनीति में लाकर और पूर्वी उत्तर प्रदेश की कमान थमाकर वोट बैंक तोड़ने का पत्ता खेला है। हालांकि प्रियंका इसमें कितना कामयाब हो पाएंगी यह तो समय ही बताएगा लेकिन बीजेपी के सामने मुश्किलें और अधिक बढ़ गयी हैं। कांग्रेस की स्थिति इस समय में यूपी में वैसे भी अच्छी नहीं है कार्यकर्ताओं का नितांत अभाव है। पार्टी का परंपरागत मतदाता भी छिटक चुका है और ज़्यादातर हिस्सों में पार्टी का संगठन भी उतना मज़बूत नहीं है। कम से कम बीते तीन दशक से उत्तर प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस की हैसियत चौथे नंबर की रही है।

2014 में नरेंद्र मोदी की लहर के सामने कांग्रेस केवल रायबरेली और अमेठी में अपनी सीटें बचा पाई थीं। 2019 में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन ने इन दोनों सीटों पर अपने उम्मीदवार न खड़े करने का ऐलान कर दिया है। लेकिन प्रिंयका को पूर्वी उत्तर प्रदेश की कमान संभालने की ज़िम्मेदारी देकर कांग्रेस ने इस मुकाबले की त्रिकोणीय बनाने की कोशिश की है।

बात अगर समाजवादी पार्टी की की जाए तो बसपा से उसका गठबंधन कितना गुल खिलाएगा यह तो जनता बताएगी लेकिन जहां तक अंकगणित का सवाल है तो उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा अपराजेय गठबंधन है। यदि दोनो पार्टियों का वोट एक दूसरे को हस्तांतरित हो गया तो उन्हें हराना बहुत मुश्किल होगा। 2014 में प्रचंड मोदी लहर के बीच भी मुलायम सिंह यादव मैनपुरी से 3,64,666 मतों से जीते थे। इस बार भी वह मैनपुरी से ही चुनाव लड़ रहे हैं इसलिए मीडिया में भी यह कहा जा रहा है कि उन्हें सबसे सुरक्षित सीट से उतारा गया है।

उधर हाशिए पर जा चुका मायावती का राजनीतिक करियर सपा से गठबंधन के बाद फिर से मेन स्ट्रीम में आ गया है और बसपा ने ज़मीनी स्तर पर बेहतर चुनाव मैनेजमेंट करने की तैयारियां शुरु कर दी हैं। सपा से बेहतर तालमेल बनाने की दिशा में काम ज़मीनी स्तर पर शुरु कर दिया गया है। बसपा कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया गया है कि सपा के साथ मिलकर प्रचार किया जाए। जनता के बीच साथ जाने पर इसका सीधा फायदा गठबंधन को होगा।


BY : Saheefah Khan




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