विशेष - कैंसर जैसी गंभीर और उपेक्षित बीमारी के लिए अध्ययन करने वाली ऐसी महिला जिन्हें मिला रेमन मैग्सेसे पुरस्कार

कैंसर जैसी गंभीर और उपेक्षित बीमारी के लिए अध्ययन करने वाली ऐसी महिला जिन्हें मिला रेमन मैग्सेसे पुरस्कार



Posted Date: 11 Mar 2019

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रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित वी. शांता का जन्म 11 मार्च, 1927 को हुआ था। वह देश की एकमात्र ऐसी महिला हैं जिन्हें उनके जनकल्याणकारी कार्यों के लिए यह सम्मान प्राप्त हुआ था। उन्होंने चेन्नई कैंसर इन्स्टीट्यूट में उन्होंने कैंसर पर रिसर्च किया है। भारत में कैंसर के रोगियों की संख्या बढ़ती जा रही है। विशेष रुप से पुरुषों में गले, फेफड़ों तथा पेट का कैंसर प्रमुखता से देखा जाता है जो तम्बाकू के कारण होता है।

स्त्रियों में गर्दन तथा स्तन का कैंसर सबसे ज़्यादा देखा जाता है। इसके बावजूद लंबे समय से इस दिशा में कोई खोजपरक काम तथा इसके इलाज के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। इस उपेक्षित क्षेत्र में इलाज तथा अनुसंधान दोनो को अपने निर्देशन पर वी.शांता जी ने संपन्न किया।

मद्रास के माइलापुर में जन्मी शांता के मामा नोबेल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिक एस. चन्द्रशेखर थे। पारिवारिक पृष्ठभूमि शुरु से अच्छी होने के कारण उन पर इसका प्रभाव पड़ा। उनकी बचपन से डॉक्टर बनने की इच्छा थी। उन्होंने 1949 में मद्रास मेडिकल कॉलेज से ग्रेजुएशन किया था तथा 1955 में उनका पोस्ट ग्रेजुएशन एम.डी. पूरा हुआ।

इसी दौरान 1954 में डी. मुत्तुलक्ष्मी रेड्‌डी ने कैंसर इन्टीट्यूट की स्थापना की थी। वी. शांता ने पब्लिक सर्विस कमीशन की परीक्षा में सफल होकर वुमन एण्ड चिल्ड्रेन हॉस्पिटल में सेवारत होने का आदेश पा लिया था, जो कि एक बेहद सम्मानित उपलब्धि थी। लेकिन जब कैंसर इन्टीट्यूट का विकल्प सामने आया तो उन्होंने बहुतों को नाराज करते हुए वुमन एण्ड चिल्ड्रेन हॉस्पिटल का प्रस्ताव छोड़कर कैंसर इन्टीट्‌यूट का काम स्वीकार कर लिया। 

13 अप्रैल, 1955 को वी. शांता कैंसर इन्टीट्यूट के परिसर में पहुँची और वहीं जम गईं। यह शांता की मानवीय संवेदना का एक प्रमाण बना। इन्स्टीट्यूट जब शुरू हुआ था, तब उसके पास एक छोटी-सी बिल्डिंग थी, बहुत थोड़े चिकित्सा प्रबन्ध थे तथा उनके साथ केवल एक और डॉक्टर थीं, जिनका नाम कृष्णमूर्ति था। पहले तीन वर्ष वी. शांता ने वहाँ अवैतनिक स्टॉफ की तरह काम किया उसके बाद उन्हें दो सौ रुपये प्रतिमाह तथा अस्पताल के परिसर में ही आवास दिया गया।

इस संस्थान में वी. शांता ने देश के पहले शिशु कैंसर क्लीनिक की नींव रखी। शांता ने देश में किया जाने वाला पहला अध्ययन सर्वेक्षण किया और उसके आधार पर देश में पहला ऐसा कार्यक्रम बनाया गया, जिसका उद्देश्य था कि गाँवों में, कैंसर की एकदम शुरुआती स्टेज पर ही पहचान की जा सके। वी. शांता ने उस कैंसर इंस्टिट्यूट में रहते हुए अपने भीतर के गहरे जुनून का परिचय दिया। उन्होंने जब तम्बाकू को पुरुषों में कैंसर पैदा करने वाले तत्व की तरह जाना तो कैंसर पर रोक-थाम की जिद में उन्होंने पुरुषों के लिए तम्बाकू छुड़ाने वाला क्लीनिक खोल दिया।

वी. शांता का रुझान अनुसंधान तथा प्रयोग की ओर भी बराबर रहा। बहुत श्रमसाध्य अध्ययन के बाद उन्होंने ‘कांबिनेशन थेरेपी’ को आजमाने का कदम उठाया। भारत में तब तक ऐसा प्रयोग कभी नहीं हुआ था, लेकिन अच्छे परिणाम के हौसले ने वी. शांता को उत्साहित किया और उन्होंने इसका सहारा लिया। यह एक सूझबूझ के साथ उठाया गया कदम था, लेकिन इसके परिणाम का पता पहले से नहीं था। वी. शांता का कदम सफल रहा और कांबिनेशन थैरेपी ने चमत्कारी नतीजे दिखाए।

इस सफलता के जरिये मुँह के कैंसर पर नियन्त्रण और उसके इलाज की राह बननी शुरू हुई। इस सफलता से वी. शांता की खोज वृत्ति थमी नहीं बल्कि तेज हो गई। उन्होंने गले, गर्दन तथा स्तन के कैंसर पर गहराई से शोध किया तथा उन्होंने शिशुओं में रक्त रोग ल्यूकेमिया को अपना लक्ष्य बनाया। उन्होंने अपने प्रयोगों के परिणाम अन्तरराष्ट्रीय मेडिकल जरनल्स में प्रकाशित कराए और दुनिया-भर से संवाद शुरू किया और 1975 में उन्होंने इस संस्थान को भारत का पहला ‘रीजनल कैंसर रिसर्च सेन्टर एण्ड ट्रीटमेंट सेन्टर’ बना दिया।

वी. शांता का हौसला अभी भी थमा नहीं था। 1984 में उन्होंने संस्थान का विस्तार एक पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज बना कर किया। इसमें शांता ने कैंसर विशेषज्ञों को प्रशिक्षण देना शुरू किया। इस कॉलेज से प्रशिक्षित होकर सैकड़ों डॉक्टर विश्वभर में कैंसर के खिलाफ अपना काम कर रहे हैं। वर्ष 1980 में शांता ने यह प्रयास भी शुरू किया कि इस कैंसर संस्थान को यूरोप, उत्तरी अमेरिका, जापान आदि देशों की साझेदारी में विश्वस्तरीय केन्द्र बना दिया जाए।

उन्होंने इस बात की भी कल्पना की कि वहां एक अत्याधुनिक तकनीक तथा यन्त्रों से युक्त प्रयोगशाला भी बने, जो शरीर के भीतर किसी भी जगह की तस्वीर लेकर विशेषज्ञों के सामने स्थिति की सही जानकारी रखे। इस आकांक्षा के साथ वी. शांता अथक रूप से अनुदान, स्वीकृतियों तथा ऋण छूट आदि जुटाने में लग गई। उन्होंने गाँवों में नर्सों को भी इस सीमा तक प्रशिक्षित करने का काम किया कि वे भी गर्दन की स्थिति के हिसाब से रोग के लक्षणों को पकड़ सकें। इस तरह प्रयासपूर्वक उन्होंने वर्ष 2000 में देश की पहली आनुवांशिक कैंसर क्लीनिक खोली, जो विरासत में आए कैंसर रोग को समझे और काबू कर सके।

 देश के लिए उनके महत्वपूर्ण योगदानों के देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें 1986 में पद्मश्री, 2005 में पद्मभूषण तथा 2015 में पद्म विभूषण से नवाज़ा। इसके अलावा वह रेमन मैग्सेसे पुरस्कार भी प्राप्त कर चुकी हैं। इसके अलावा वह विश्व स्वास्थ्य संगठन की सलाहकार समिति की सदस्य है साथ ही दूसरी बहुत सी राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं उन्हें सम्मानित कर चुकी हैं।


BY : Saheefah Khan




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