आजमगढ़ - अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस : आज़मगढ़ की ऐसी महिला जिसने अपने बुलंद हौसलों के दम पर बदल दी शहर की तस्वीर

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस : आज़मगढ़ की ऐसी महिला जिसने अपने बुलंद हौसलों के दम पर बदल दी शहर की तस्वीर



Posted Date: 08 Mar 2019

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आज़मगढ़। आज दुनिया में वीमेंस डे धूमधाम से मनाया जा रहा है। सेलिब्रिटी से लेकर आम आदमी तक आज महिलाओं की गौरव गाथा को याद कर रहा है सोशल मीडिया पर महिला सशक्तिकरण से संबधित ट्वीट, वीडियो शेयर किये जा रहे हैं ऐसे में आज़मगढ़ की महिला सशक्तिकरण की प्रतीक महिलाओं की बात न की जाए तो यह बड़ा अन्याय होगा। यूं तो आज़मगढ़ की सरज़मीं एक से बढ़कर एक सूरमाओं का सुनहरा अतीत समेटे हुए। अनेक शायर, लेख़क, कवि, गीतकार आदि इस शहर ने दिए हैं लेकिन आज बात करते हैं वर्तमान समय की महिला सशक्तिकरण की प्रतीक नगरपालिका अध्यक्ष शीला श्रीवास्तव की।

1966 में इलाहाबाद में जन्मीं शीला श्रीवास्तव ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन किया और फिर गिरिश चन्द्र श्रीवास्तव से ब्याह कर आज़मगढ़ चली आयीं। पति गिरिशचन्द्र श्रीवास्तव आज़मगढ़ नगर पालिका के अध्यक्ष बने तो पूरे शहर में परिवार का रुतबा और बढ़ गया। हंसी खुशी दांपत्य जीवन को निभा रही शीला को यह गुमान भी नहीं था कि उनके जीवन में खौफनाक मोड़ आने वाला है।

तीसरी बार नगर पालिका अध्यक्ष चुनने के कुछ समय बाद पति गिरिश चन्द्र की अचानक हार्ट अटैक से मौत हो गई और परिवार पर सदमे का पहाड़ टूट पड़ा साथ ही पूरा ग़म में डूब गया क्योंकि गिरिश चन्द्र सबके मसीहा और एक आदर्श ज़मीनी नेता समझे जाते थे। इस लिए उनकी मौत के पश्चात शहरवासी शीला श्रीवास्तव से चुनाव लड़ने की मांग करने लगे।

पति की मौत का सदमा और परिवार की ज़िम्मेदारी से निकलकर वह यह निर्णय नहीं ले पा रही थीं कि क्या करें। आखिरकार सबके मनाने के बाद वह चुनाव लड़ने को तैयार हो गईं। शहर की जनता ने भरपूर समर्थन देते हुए भारी वोटों से उन्हें विजयी बना दिया। तब से उन्होंने शहर को स्वच्छ एवं सुंदर बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अपने पति के कदमों पर चलते हुए उन्होंने शहरवासियों के दिलों में अपनी जगह बना ली।

पांच साल बाद जब 2017 में चुनाव हुए तो उन्होंने 0189 वोट हासिल कर दूसरी चेयरमैन की कुर्सी हासिल कर ली। और इस प्रकार लगातार पांच बार से श्रीवास्तव परिवार का अध्यक्ष की कुर्सी पर कब्ज़ा है। उनके समय में शहर में अनेक परिवर्तन देखने को मिले। स्वच्छ भारत अभियान में शहर को नंबर वन का ख़िताब मिला। कई गांव खुले में शौच मुक्त हो गए। हाल ही में उनकी अगुवाई में नगर पालिका ने आधुनिक तकनीक से लैस मोबाइल टॉयलेट की सुविधा शहर में शुरु की।

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हालांकि उनका यह सफर इतना आसान नहीं रहा। आज़मगढ़ जैसे शहर में एक महिला के रुप में नगर पालिका अध्यक्ष की कुर्सी संभालना उनके लिए काफी चुनौतीपूर्ण था। विरोधी तंज़ कसते थे कि एक और क्या शहर का विकास करेगी। लेकिन उन्होंने अपने साहसपूर्ण कदम से सभी धारणाओं को गलत साबित कर दिखाया और अपने पति के मान सम्मान को और अधिक बढ़ा दिया।

निर्दलीय जीत के साथ उन्होंने शहर के विकास के लिए कदम आगे बढ़ाया था लेकिन बाद में बहुजन समाज पार्टी का दामन थाम सक्रिय राजनीति में आ गईं। समय के उनके हौसले और कदम डिगे नहीं बल्कि और मज़बूत होते चले गए। शहर की महिलाओं के लिए वह एक प्रेरणा स्त्रोत बन चुकी हैं।

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BY : Saheefah Khan




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