विशेष - मज़बूत नेता, स्वतंत्रता सेनानी और समाजवादी लोकतंत्र की वकालत करने वाले ऐसे साहसिक व्यक्ति जो बने देश के उप प्रधानमंत्री

मज़बूत नेता, स्वतंत्रता सेनानी और समाजवादी लोकतंत्र की वकालत करने वाले ऐसे साहसिक व्यक्ति जो बने देश के उप प्रधानमंत्री



Posted Date: 12 Mar 2019

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12 मार्च, 1913 को जन्में यशवंतराव बलवंतराव चह्वाण देश के पांचवे उपप्रधानमंत्री और महाराष्ट्र के प्रथम मुख्यमंत्री थे। उन्हें एक मज़बूत कांग्रेस नेता, स्वतंत्रता सेनानी, सहकारी नेता एवं सामाजिक कार्यकर्ता के रुप में याद किया जाता है। वह अपने भाषण एवं लेखों के द्वारा समाजवादी लोकतंत्र की वकालत करते थे। उन्होंने महाराष्ट्र में किसानों की बेहतरी के लिए सहकारी समितियों को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

महाराष्ट्र के सातारा जिले के एक किसान परिवार में जन्में यशवंतराज के पिता का बचपन में ही देहांत हो गया था। इसलिए उनका पालन पोषण उनके चाचा ने किया। वह बचपन से ही भारत के स्वतंत्रता संग्राम से प्रभावित थे। प्रतिकूल पारिवारिक स्थिति के बावजूद यशवंतराव अपनी शिक्षा पूर्ण करने में सफल रहे। पुणे से कानून की डिग्री लेने के बाद वह वकालत करने लगे। 1932 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में कुछ समय भूमिगत रहकर सतारा के आंदोलन में सहायता देते हुए 1943 में गिरफ्तार कर लिए गए।

जेल से रिहा होने के बाद चह्वाण मुंबई विधानसभा के सदस्य चुने गए। 1952 के चुनाव में सफल होने पर उन्हें मंत्रिमंडल में लिया गया। फिर वे मुंबई के मुख्यमंत्री और गुजरात के पृथक राज्य बनने पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने। 1962 के चीनी आक्रमण के समय जब कृष्ण मेनन को रक्षा मंत्री का पद छोड़ना पड़ा तो यशवंतराव चह्वाण को देश के रक्षा मंत्री के पद पर नियुक्त किया गया। 1966 तक वे इस पद पर रहे। फिर उन्होंने क्रमशः गृहमंत्री, वित्त मंत्री और विदेश मंत्री के पद संभाले।

1969 के कांग्रेस विभाजन के समय यशवंतराव चह्वाण के व्यवहार की आलोचना हुई थी। पहले उन्होंने इंदिरा जी के विरोध में मत दिया, किन्तु जब उस पक्ष को सफलता नहीं मिली तो वे फिर इंदिरा की कांग्रेस में आ गए। 1977 की कांग्रेस की पराजय के बाद चह्वाण प्रतिपक्ष के नेता बने थे। जनता पार्टी की सरकार के गिरने पर उन्होंने एक बार फिर दल बदला और चरणसिंह के साथ मिल गए। चरणसिंह की सरकार तो नहीं बन पाई, लोगों की दृष्टि में चह्वाण की प्रतिष्ठा गिर गई।

लंबी और सक्रिय राजनीति में रहने के बावजूद वह अपने जीवन के अंतिम दिनों में गुमनाम हो गए। उनसे राजनीति के जोड़ तोड़ सीख नेता बने लोग भी उनकी भूल गए। 25 नवंबर, 1984 को दिल्ली में उनका निधन हो गया।


BY : Saheefah Khan




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