विशेष - मिलिए वुमेन्स डे की हीरो से : विधवा से लेकर बीमार शरीर, फिर भी हाथ से नहीं छूट रहा कलम

मिलिए वुमेन्स डे की हीरो से : विधवा से लेकर बीमार शरीर, फिर भी हाथ से नहीं छूट रहा कलम



Posted Date: 07 Mar 2019

1252
View
         

आप लिखते हैं? कभी तो लिखा होगा? लिखना शुरू किया लेकिन.. समय नहीं मिला तो छोड़ दिया.. लिखते थे लेकिन पिछले एक हफ्ते से ज़ुकाम है तो कलम और मैं दोनों छुट्टी पर हैं। और कितने बहानें हैं आपकी जेब में? हर कोई लिखता है, पढ़ता है फिर किसी न किसी बहाने से ब्रेक लेता है ऐसा ब्रेक कि लिखने-पढ़ने की लत ही छूट जाती है। ऐसे में एक बूढ़ी औरत हैं, जो खांमखां तुर्रमखां बन रही हैं।

भला ऐसा भी कोई करता है क्या? पिछले 14-15 साल से बीमार हैं, सूजे हुए पैरों से चल भी नहीं पाती, 14 साल पहले शौहर का इंतकाल हो गया, दो बेटियां है जिनकी शादी की उम्र लगभग निकली जा रही है पैसे नहीं हैं तो निक़ाह नहीं कर पा रहीं, एक शादीलायक बेटा है जो पढ़ने या नौकरी के लिए वक़्त कहां से लाए? बुनकर के काम से, जिस पर सरकार का ध्यान थोड़ा कम ही रहता है, 4000 हजार महीना कमाता है, बचत तो भूल ही जाइए, फिर भी पता नहीं क्या सनक है लखनऊ के पास काकोरी की रहने वाली 56 साल की नूर जहां को जो लिखना नहीं छोड़ पा रहीं।

यहीं तो हैं हमारी आपकी महिला सशक्तिकरण की हीरो। ऐसे हीरो पारिवारिक, शारीरिक, आर्थिक और मानसिक बीमारियां को ‘बाद में आइएगा’ का बोर्ड दिखा देते हैं और शुरू कर देते हैं अपना काम। वो काम जिससे शायद पैसे न मिले, जिससे शायद पहचान न मिले, जिससे शायद घर की समस्या न हल हो लेकिन फिर भी चार दांत दिखें ऐसी मुस्कुराहट पाने के लिए सही, वो अपना काम नहीं छोड़ते।

नूर जहां फिलहाल बिस्तर पर हैं और लिख रही हैं। इनका लिखा छपता नहीं, इनका लिखा कोई पढ़ता नहीं है क्योंकि किसी तक पहुंचता नहीं है और शायद इससे नूर जहां को फ़र्क भी नहीं पड़ता। भाड़ में जाएं छापने वाले, भाड़ में जाएं पढ़ने वाले। नूर जहां की लिखने की शर्त और ज़रूरत है सिर्फ एक काग़ज और एक कलम।

आप विश्वास करेंगे कि लिखने की ऐसी भी तड़प हो सकती है। जब पैसे नहीं होते, नई दस्ती नहीं खरीद पातीं तो अखबार में मास्टर हेड के ऊपर की खाली जगह पर वो लिखती हैं, पुरानी कॉपी भर जाने पर उसकी पीछे दफ़्ती पर बिल्कुल नीचे तक कलम घसीट लाती हैं। नूर जहां को एक वक्त की रोटी नहीं मिलती लेकिन कलम उनसे दूर न हों। मोहल्ले वाले न जानें क्या-क्या सोचते होंगे उनके बारे में, लापरवाह मां, बीमार पागल बूढ़िया और न जानें क्या-क्या लेकिन नूर जहां अपनी खिड़की से सिर्फ उन्हीं आवाज़ों के इंतजार में रहती हैं जो उनसे कहें, ‘आपा, क्या लिखा है, लाइए ज़रा पढ़ें’

एक बीमार औरत, एक मजबूर मां और तड़पती लेखिका जब कलम उठाती है तो हर बार नए किस्से बुनती है। आश्चर्य होता है कि जिस औरत ने 14-15 साल घर की दहलीज़ नहीं लांघी, जिसने न जाने कितने दिन से अपने घर के किसी कोने को नहीं छुआ वो कैसे उन तमाम लोगों से बेहतर गज़लें, कहानियां, किस्से, नाटक लिख लेती हैं जो पूरी दुनिया घूमते हैं किसी कहानी की तलाश में।

नूर जहां की आंखें उन कदमों के इंतज़ार में हैं जो उनके हाथों से दस्ती लेकर उसे पढ़ें। उनके कान तारीफ़ नहीं सुनना चाहते बस चाहते हैं सुनना कि, ‘लाइए पढ़ें’। हम जल्द ही कोशिश करेंगे आपको नूर जहां की कुछ रचनाओं से रूब़रू करा पाएं।

(Report/Input : Abdul Mannan)


BY : Yogesh




Loading...




Loading...