चुनावी यात्रा : कैसा है एक ब्राह्मण सांसद के गोद लिए गांव में हरिजनों का हाल?

29 अप्रैल को कानपुर की दोनों लोकसभा सीटों पर मतदान हो गया। कानपुर में दो लोकसभा सीटे हैं- कानपुर नगर और कानपुर देहात (अकबरपुर)। वर्तमान में कानपुर नगर से सांसद बीजेपी के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी हैं और अकबरपुर से देवेंद्र सिंह उर्फ भोले सिंह। कानपुर एक बड़ा क्षेत्र है जहां पांच विधानसभा सीटे हैं कानपुर नगर और पांच कानपुर देहात में हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार कानपुर देहात की जनसंख्या 1,796,184 और कानपुर नगर की 29.2 लाख है।

(गांव का प्रवेश द्वार)

11 अक्टूबर 2014 को जयप्रकाश नारायण के जन्मदिवस के मौके पर देश के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री ने देश के गांवों को विकसित करने के लिए सांसद आदर्श ग्राम योजना लॉन्च की। इस योजना के तहत देश के सभी सांसदों ने अपने लोकसभा क्षेत्र का एक गांव गोद लिया और उसके विकास पर खास ध्यान दिया। ऐसे में कानपुर जैसे बड़े क्षेत्र में अगर कोई गांव अपने सांसद की गोद में जाता है तो वो उस गांव के लिए सौभाग्य की बात होगी।

(गांव की मुख्य सड़क के आसपास की गलियां)

कानपुर के सांसद मुरली मनोहर जोशी ने भी अपनी पास की लोकसभा सीट अकबरपुर के एक गांव को गोद लिया क्योंकि उनकी लोकसभा सीट में ऐसा कोई गांव नहीं था जो सांसद आदर्श ग्राम योजना के मानकों पर खरा नहीं उतर रहा था। ऐसे में अपनी चुनावी यात्रा के दौरान हमारा पहला पड़ाव पड़ा जोशी का गोद लिया गांव सिंहपुर।

(अपने घर के बाहर छोटे लाल)

हमें पता चला कि सिंहपुर एक सवर्ण बाहुल्य गांव है लेकिन कई जातियां यहां ठीकठाक संख्या में निवास करती हैं। चूंकि मुरली मनोहर जोशी जाति से ब्राह्मण हैं और आडवाणी के अध्यक्षता के दौर में एक कट्टर हिंदू की छवि के तौर पर भी जाने जाते थे। इसलिए इस गांव के हरिजनों से मिलना ज़रूरी था। ये जानना ज़रूरी था कि एक सवर्ण सांसद अपने गोद लिए गांव के हरिजनों से कितना प्रेम करता है?

(सवर्णों की गलियां)

वर्तमान राजनीति प्रतीकों के आसपास घूमती है, जिसका एक हिस्सा गरीब या हरिजनों के घर भोजन करना भी है। कई बार लोग हरिजनों से प्रेम का मतलब इन्हीं प्रतीकों से समझते हैं। सिंहपुर गांव इन प्रतीकों से दूर है। यहां किसी प्रकार की सामाजिक समानता का दिखावा नहीं होता। लोग गर्व से कहते हैं कि हम ब्राह्मण हैं और हरिजनों के टोले को जाने से बचते हैं। भौतिक अंतर आपको सर्वणों के मुहल्लों-मकानों और हरिजनों के छप्परों-गलियों को देखकर पता चलता है।

(इसी गली में सवर्ण जाति के लोग और ग्राम प्रधान के खानदानी रहते हैं)

पूरा गांव लगभग पक्की सड़क से युक्त है और बिजली भी आती है लेकिन नालियों और सफाई की जो व्यवस्था गांव की कुछ गलियों में है वो अन्य से अलग है। इसके लिए गांव के हरिजन टोला में रहने वाली पासवान जाति की शांति आरोप लगाते हुए कहती हैं कि ये भेदभाव सिर्फ इसलिए होता है क्योंकि वो हरिजन हैं। इस गांव के हरिजनों में शिकायत एक आक्रोश के साथ निकलती है। उज्जलवा योजना के लाभ के सवाल पर शांति कहती हैं कि इस प्रकार की किसी सरकारी सुविधा का लाभ नहीं मिला। उनसे कहा गया कि उनका सूची में नाम ही नहीं है।

(हरिजनों के मुहल्ले को जाने वाला रास्ता)

इनका कहना है कि इन्होंने कभी अपने सांसद (जोशी, जिन्होंने गांव गोद लिया है) को आंखों से नहीं देखा मतलब वो कभी इस गांव में नहीं आए। एक अन्य निवासी छोटे लाल का कहना है कि गांव में नाली साफ करने के लिए सफाईकर्मी नियुक्त है लेकिन वो महीने-दो महीने में कभी कभार आता, उन्हें खुद नालियों और सड़कों की सफाई करनी पड़ती है। सरकार की ओर से इन्हें निवास (कॉलोनी) भी हरिजनों को आवंटित नहीं हुआ। आखिर में वोट देने के सवाल पर छोटे लाल कहते हैं कि जो दरवाज़े पर आ जाता है उसे ही वोट दे देते हैं।

(हरिजनों की गली)

इनकी एक शिकायत और है कि सरकार ने इनके खाते में आने वाली पेंशन पर रोक लगा दी। दरअसल इनका मतलब समाजवादी पेंशन योजना से था, जिसे प्रदेश सपा सरकार ने अपनी महत्वाकांशी योजना के तौर पर 2014-15 में शुरू किया था। इस योजना के तहत जिले के लाभार्थियों को तिमाही किस्त के तौर पर 1500 रुपए उनके बैंक अकाउंट में भेजे जाते थे। प्रदेश में सरकार बदलने के बाद योगी सरकार ने इस योजना पर घोटाले का आरोप लगाते हुए रोक लगा दी थी।

(ग्राम प्रधान का घर)

चूंकि ग्राम पंचायत में सामान्य महिला प्रधानी सीट थी इसलिए गांव की प्रधान शोभा दीक्षित हैं लेकिन प्रधान के तौर पर लोग उनके पति पप्पू दीक्षित को जानते हैं। शांति कहती हैं कि जब प्रधान से पेंशन के बारे में पूछो तो कहते हैं कि ‘तुम कहां 60 साल की हो? तुम्हें क्या ज़रूरत पेंशन की?’ शांति की उम्र का अनुमान आप हमारे फेसबुक पेज पर लाइव विडियो से लगा सकते हैं। जब हमने ग्राम प्रधान के प्रतिनिधि (प्रधान के पुत्र) से बात की तो उन्होंने हरिजनों की कुछ शिकायतों को सिरे से खारिज कर दिया और कुछ का ठीकरा सरकार पर फो़ड़ दिया।

(सरकार द्वारा आवंटित राशि से बनवाए शौचालए के साथ शांति)

घर-घर शौचालय पहुंचाने के लिए बीजेपी सरकार प्रशंसा की पात्र है। तमाम भेदभाव और जातिगत आधार पर विकास से वंचित हरिजन जाति के शांति और छोटेलाल के घर में भी सरकारी शौचालय पहुंच गया है। उम्मीद खो चुकी शांति कहती हैं कि, ‘सरकार से हमें कोई उम्मीद नहीं है। अगर सरकार कुछ भेजेगी तो ये बीच वाले खा लेंगे।’ हमने जब शांति से पूछा कि वो प्रधानमंत्री को जानती हैं? तो वो कहती हैं कि, ‘हम नई जानते लाला’। वो कहती हैं कि, ‘टीवी में नाम सुना है नरेंद्र मोदी का लेकिन जानते नहीं कौन है? वो देश के लिए कछु किए हौं, हमाए लिए कुछु नहीं किए।’

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