राजनीति - एक महीने बाद भी नहीं बंटी सपा+बसपा में सीटें, प्रियंका के पावर में आने से बदली रणनीति?

एक महीने बाद भी नहीं बंटी सपा+बसपा में सीटें, प्रियंका के पावर में आने से बदली रणनीति?



Posted Date: 11 Feb 2019

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नई दिल्ली। लंबे समय से अधिकतर प्रदेशों और देश में बैकफुट पर चल रही कांग्रेस अचानक दो कारणों से 2019 की लोकसभा रेस में सबसे मज़बूत दावेदार बन गई है। तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों में जीत और सक्रीय राजनीति में प्रियंका गांधी की एंट्री। इसका नतीजा ये निकला कि कांग्रेस अपना रोड शो करने लखनऊ पहुंची ही थी कि सपा-बसपा ने समझौता करने का मन बना लिया लेकिन अब कांग्रेस की मांग बढ़ गई है।

सूत्र बता रहे हैं कि सपा-बसपा ने सूबे की 80 लोकसभा सीटों में से कांग्रेस को 15 सीटों का ऑफर दे दिया है, लेकिन अब पार्टी ने सीटों की डिमांड बढ़ा दी है। कांग्रेस सूबे में कम से कम 25 संसदीय सीट चाहती है। कांग्रेस नेताओं की मानें तो वह सूबे में सपा-बसपा के बराबर ही सीटें चाहती है। इस तरह से उनके लिहाज से तीनों पार्टियां 25-25 सीटों पर चुनाव लड़ें और बाकी बची पांच सीटें आरएलडी जैसी छोटे सहयोगी दलों के लिए रखा जाए।

पिछले महीने सूबे के दो परस्पर विरोधियों ने हाथ मिल लिया था। इस दौरान सपा-बसपा ने 38-38 सीटों पर लड़ने का फैसला किया था। गठबंधन की ओर से दो सीटें कांग्रेस के लिए बिना किसी शर्त के छोड़ दी गईं थी। दोनों पार्टियों ने फैसला किया था सपा-बसपा अमेठी और रायबरेली में अपना कोई उम्मीदवार नहीं उतारेगी।

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हांलांकि एक महीना हो गया लेकिन सपा-बसपा की ओर से सीटों के बंटवारे की कोई खबर नहीं आ रही है। सूत्रों की मानें तो प्रियंका गांधी की सक्रीय राजनीति में एंट्री इसका कारण है। दोनों पार्टियां कोई नई राजनीतिक रणनीति बनाएंगी और फिर सीटों का बंटवारा होगा।

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दूसरी ओर कांग्रेस प्रियंका गांधी की एंट्री के बाद से ही आत्मविश्वास से लबरेज़ है। कांग्रेस प्रियंका को दूसरी इंदिरा गांधी के रूप में प्रचारित कर रही है। कांग्रेस जिस तरह से दिल्ली में अल्पसंख्यक सम्मेलन किया और राहुल गांधी ने ओबीसी दलित मतों को साधने के लिए 13 प्वाइंट रोस्टर को लेकर सवाल खड़े किए हैं। उससे सपा-बसपा में बेचैनी बढ़ना स्वाभाविक था।


BY : Yogesh




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