विशेष - ‘..चौड़ी हुई सड़क तो मेरा गांव कट गया’

‘..चौड़ी हुई सड़क तो मेरा गांव कट गया’



Posted Date: 06 Feb 2019

2452
View
         

 ‘मंज़िल क़रीब आते ही एक पांव कट गया, चौड़ी हुई सड़क तो मेरा गांव कट गया’, आपका गांव कहां है? जब कोई आपसे ये पूछता है तो बताने में संकोच तो नहीं होता आपको? अगर नहीं होता तो ज़िंदा हैं आप। किसने आपसे आपका गांव छीन लिया? इस शहर ने, जिसकी चमक वैसे ही है जैसे नाली का पानी चमकता है- झूठा और बदबूदार। लेकिन इस शहर को कोसने का क्या फ़ायदा? शहर गांव का थोड़ी न था, गांव के तो आप थे। कहीं आपने भी तो अपने भीतर गांव नहीं मार दिया?

आंकड़े ये कहते हैं कि हर तीन में दो लोग गांव में रहते हैं। बचा एक इंसान शहर में आपको दो शक्लों में मिलेगा, पहला जो गर्व से कहता है कि मेरा गांव छूट गया, ऐसे लोगों को ये शहर एक अनाथ से अधिक कुछ नहीं समझता और एक वो लोग जो मुंह लटकाकर बोलते मिलेंगे कि ‘मेरा गांव छूट गया, यार’, इन लोगों के गांव छूटने का मतलब होता है घर छूटना।

क्या है गांव? एक ऐसी जगह जिसके लिए सबके अलग मायने हैं। किसी के लिए अम्मा-बाबा का घर है, किसी के लिए वेकेशन डेस्टीनेशन है, किसी के लिए अभावों का अनुभव है तो किसी के लिए समृद्धता की परिभाषा। तो ये शहर क्या है? ये शहर वो बनिया है जिसके पास पैसा है, ज़मीन है, संसाधन हैं, सब कुछ है और सब आपको देने के लिए तैयार है लेकिन बदले में कुछ मांगता है, जबतक भावशून्य होकर कोई वस्तु आप इस शहर के पास गिरवी नहीं रखेंगे तब तक ये शहर आपको गलियों में भी जगह नहीं देगा।

‘अमीरों की पकाई नहीं खाते, हम गर्मी के मौसम में मिठाई नहीं खातें’

गांव आज़ादी का दूसरा नाम है, जहां आप एक तंग जीवन जीने से आज़ाद हैं, आप आज़ाद हैं क्योंकि आप मनचाहा आहार खा सकते हैं। गांव में रहने वाले लोगों से पूछिए तो पाएंगे कि 15 अगस्त 1947 के बाद वास्तविक आज़ादी तो गांव में ही आई है, शहरवासी तो आज भी खुद के गुलाम हैं।

गांव आपकी जड़ें हैं, पेड़ के फल-फूल मीठे और सुंदर-खुशबूदार दोनों होते हैं लेकिन जड़े ही किसी पेड़ को पैदा करती हैं और बड़ा होने देती हैं। जायसी के शहर रायबरेली में पैदा हुए और शहर-ए-सुखन लखनऊ के निवासी शायर मुनव्वर राणा के ऊपर लिखे दोनों शेर एक झूठे और वहम से भरे शहर को शहर को बताने के लिए काफी हैं। गांव पहचानिए इस छोटे से लेख को एक मुनव्वर राणा का ही एक शेर पूरा करता है-

'अजब दुनिया है नाशायर यहाँ पर सर उठाते हैं,

जो शायर हैं वो महफ़िल में दरी- चादर उठाते हैं।

तुम्हारे शहर में मय्यत को सब काँधा नहीं देते,

हमारे गाँव में छप्पर भी सब मिल कर उठाते हैं।'


BY : Yogesh




Loading...




Loading...